Monday, May 20, 2019

संतुष्ट न होने पर रिकॉर्डिंग देख सकेंगे आवेदक।

                अब ड्राइविंग लाइसेंस बनवाने के लिए मोबाइल के जरिये टेस्ट देना होगा। मारुति और माइक्रोसॉफ्ट मिलकर इसका साफ्टवेयर बना रहे हैं। जिसकी टेस्टिंग अगले महीने से झाझरा स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ ड्राइविंग ट्रेनिंग एंड रिसर्च आईडीटीआर में शुरू हुई है। ड्राइवर की ट्रायल सफल रहने के बाद परिवहन विभाग सॉफ्टवेयर के जरिये लाइसेंस बनाने की प्रक्रिया शुरू करेगा। परिवहन विभाग के अधिकारियों के मुताबिक उत्तराखंड देश का ऐसा पहला राज्य होगा, जिसमें ये व्यवस्था शुरू की जाएगी।
मोबाइल में साफ्टवेयर अपलोड करने के बाद उसे वाहन के फ्रंट मिरर पर लगा दिया जाएगा। लाइसेंस का आवेदक जब वाहन चलाएगा तो सॉफ्टवेयर गतिविधि के हिसाब से नंबर देगा।
                जिसकी रिपोर्ट के बाद ही ड्राइविंग लाइसेंस बनेगा। मोबाइल में फीड किए गए साफ्टवेयर से तय होगा कि टेस्ट के दौरान आवेदक ने वाहन सही तरीके से चलाया गया या नहीं। इसका बड़ा फायदा यह होगा कि इसके जरिये वास्तविक ड्राइवर का ही लाइसेंस बनेगा, जिससे दुर्घटनाओं में भी कमी आएगी।

                फिलहाल ड्राइविंग टेस्ट लेने के लिए चालक से वाहन चलवा कर वहां मौजूद अधिकारी तय करता है कि आवेदक को वाहन चलाना आता है या नहीं, लेकिन इस मोबाइल में अपलोड साफ्टवेयर को वाहन के फ्रंट मिरर के पास लगाकर ड्राइविंग टेस्ट लेने के बाद चालक को अलग-अलग टेस्ट देने होंगे।

                 जैसे कार पार्किंग करना, चढ़ाई पर कार रोक कर वापस चलाना, रेड लाइन पर जेब्रा क्रासिंग के रुकना और मार्ग पर लगे विभिन्न बोर्ड के हिसाब से वाहन चलाना आदि शामिल है। आईडीटीआर में परीक्षण के दौरान अगर आवेदक असंतुष्ट होता है तो वह अपनी रिकॉर्डिंग भी देख सकेगा। इस व्यवस्था से पारदर्शिता आएगी। साथ ही फर्जीवाड़े पर भी अंकुश लगेगा।

                 मारुति और माइक्रोसॉफ्ट की ओर से सॉफ्टवेयर पर काम किया जा रहा है। जो अंतिम चरण में है। अगले महीने के अंत तक इसकी टेस्टिंग शुरू हो जाएगी। देहरादून देश का पहला ऐसा शहर होगा, जहां इस तरह के हाईटेक सॉफ्टवेयर के जरिये ड्राइविंग टेस्टिंग होगी। यह जानकारी आशीष शुक्ला, उप निदेशक आईडीटीआर द्वारा दी गई।

                 सॉफ्टवेयर का ट्रायल सफल रहता है तो इसका प्रयोग किया जाएगा। इससे ड्राइविंग लाइसेंस बनाने की प्रक्रिया और भी बेहतर बनेगी। आवेदक को किसी भी तरह का संदेह नहीं रहेगा। वह वीडियो के जरिये देख सकेगा कि उससे कहां गलती हुई।

Sunday, May 19, 2019

दिग्गी हैं तो मुमकिन है। देश की चर्चित सीट।

दिग्गी राजा की सकारात्मक व योजनाबद्ध चुनाव प्रचार की शैली से भोपाल लोकसभा चुनाव सदियों तक याद रखा जाएगा...

मध्यप्रदेश में 29 लोकसभा सीट हैं लेकिन पूरे चुनाव के दौरान समूचे देश की सबसे चर्चित सीट रही भोपाल लोकसभा। दो कारणों से ये सीट चर्चा में रही, पहला कारण कांग्रेस पार्टी ने मध्यप्रदेश के 10 साल मुख्यमंत्री रहे अपने सबसे अनुभवी और चर्चित चेहरे दिग्विजय सिंह जी को चुनाव मैदान में उतारा। दूसरा सबसे बड़ा कारण मध्यप्रदेश भाजपा को चुनाव लड़ने के लिए जब कोई योग्य उम्मीदवार नही मिला तो बीजेपी ने विश्व का पहला उदाहरण प्रस्तुत करते हुए चाकूबाजी, हत्या व आतंकवाद जैसे जघन्य मामलों की आरोपी प्रज्ञा ठाकुर को पूरे देश में वोटों के ध्रुवीकरण के लिए भोपाल से अपना प्रत्याशी बनाया। जनता ने दोनों ही प्रत्याशी को नजदीक से देखा, जहां दिग्विजय सिंह जी इसीलिए चर्चित हुए कि उन्होंने भोपाल के विज़न के साथ सकारात्मक चुनाव प्रचार किया वहीं प्रज्ञा ठाकुर अपने तथ्यहीन बयानों से चर्चा में रहीं और वैसे भी प्रज्ञा ठाकुर वही कर रहीं थी जो उनसे करने को कहा गया था ये और बात है कि उनके एक भी तीर निशाने पर नही लगे।

प्रज्ञा ठाकुर नकारात्मक चुनाव प्रचार करने आई थी इसीलिए उन्होंने खुद को प्रताड़ित करने की झूठी कहानी महिलाओं को सुनाई और उसी कहानी में शहीद हेमंत करकरे को विलेन बनाने का कुत्सित प्रयास भी किया। शहीद हेमंत करकरे पर अपमान जनक टिप्पणी करने पर जब देश में आग सुलगने लगी तो चुनाव आयोग ने प्रज्ञा ठाकुर को 72 घंटे के लिए बैन कर दिया। इस पूरे चुनाव की खास बात यह भी रही कि बीजेपी नेताओं ने प्रज्ञा ठाकुर को अलग थलग छोड़ दिया। हाँ सभी ने पक्की वाली मुंह दिखाई ज़रूर की। नही तो पहली बार ये देखने को मिला कि प्रज्ञा ठाकुर के साथ प्रचार पर गिने चुने 10-20 लोग ही जा रहे थे और टीव्ही चैनलों पर चल रही चुनावी डिबेट पर बड़े नेताओं के साथ 100-200 लोग जा रहे थे। इसका सीधा मतलब है कि दिग्विजय सिंह जी जैसी बड़ी शख्सियत के सामने बीजेपी नेताओं ने पहले ही घुटने टेक दिए थे वे पूरे समय सिर्फ रस्म अदायगी कर रहे थे।

भाजपा की लाख कोशिशों के बाद भोपाल चुनाव के केंद्र बिंदु दिग्विजय सिंह जी ही रहे। जिस व्यक्ति ने अपनी मज़बूत दृढ़ इच्छाशक्ति से 3300 किलोमीटर की नर्मदा जी की कठिनतम परिक्रमा पैदल की हो उनसे आक्रामक और जोश से परिपूर्ण चुनाव लड़ने की उम्मीद अमूमन सभी को होगी। 72 वर्ष की आयु में उन्होंने भोपाल-सीहोर लोकसभा क्षेत्र के कोने कोने को नाप दिया। जब बीजेपी ने प्रत्याशी घोषित किया तब तक दिग्विजय सिंह जी लोकसभा क्षेत्र में 2 बार घूम चुके थे। उन्होंने भोपाल के हर एक पहलू को छुआ और उनका चुनाव प्रचार लोकसभा क्षेत्र के सुनियोजित और सुसंगत विकास की योजनाओं पर केंद्रित रहा। दिग्विजय सिंह जी के सकारात्मक चुनाव प्रचार के कारण बीजेपी के ध्रुवीकरण के प्रयासों पर पानी फिर गया। बीजेपी ने कई बार कोशिश की कि चुनाव को अपने हिसाब से मोल्ड कर दें लेकिन दिग्विजय सिंह जी के योजनाबद्घ चुनाव प्रचार के आगे बीजेपी के हर पैंतरे नाकामयाब रहे।

दिग्विजय सिंह जी भोपाल-सीहोर के चहुंमुखी विकास के एजेंडे के साथ चुनाव मैदान में उतरे, उन्होंने "भोपाल विज़न" नाम से विकास का खाका प्रस्तुत किया। कांग्रेस के विज़न को बुद्धिजीवी वर्ग ने खूब सराहा वहीं प्रज्ञा ठाकुर का चुनाव एजेंडा फिक्स था, हार्डकोर हिंदुत्व जो दिग्विजय सिंह की विकास की अवधारणा के सामने चित्त हो गया। प्रज्ञा ठाकुर की कट्टर और आपराधिक छवि की वजह से पढ़े लिखे और बल्कि वे मतदाता जिन्होंने सदियों बीजेपी को वोट दिया वे भी उनसे किनारा करते नज़र आये।

भोपाल लोकसभा क्षेत्र के ज्यादा से ज्यादा मतदाताओं से रूबरू होने की ललक में दिग्विजय सिंह जी ने भोपाल में पद यात्रा करके चुनाव को और रोचक बना दिया। उनकी चुनाव प्रचार की सकारात्मक और योजनाबद्ध शैली से भोपाल का 2019 का यह चुनाव सदियों तक याद रखा जाएगा इसमें किंचित मात्र का भी संदेह नही है। दूसरी याद रखने वाली वजह प्रज्ञा ठाकुर भी होंगी जो अब शहीद करकरे को अपमानित करने के बाद महात्मा गांधी जी के हत्यारे नाथूराम गोडसे को देश भक्त कह कर महिमामंडित कर रही हैं, इसी को कहते हैं मुंह में राम बगल में नाथूराम(छुरी)। अब प्रज्ञा ठाकुर के बयान पर मोदी जी कह रहे हैं कि मैं उन्हें माफ नही करूँगा, तो मोदी जी आपको उन सभी लोगों से माफी मांगना चाहिए जिन्होंने आपके द्वारा चुनाव में खड़ी की गई प्रत्याशी प्रज्ञा ठाकुर को वोट दिया है। मोदी जी आपके प्रज्ञा ठाकुर को माफ नही किये जाने वाले बयान की वजह से प्रज्ञा ठाकुर को वोट देने वाले मतदाता अपने आपको ठगा सा महसूस कर रहे हैं। मोदी जी आपकी पार्टी ने चुनाव के दौरान यह कहा कि प्रज्ञा को नही मोदी को वोट दीजिये लेकिन अब आप उसी प्रज्ञा ठाकुर के बयानों पर शर्मिंदा हैं। क्या ये भोपाल के मतदाताओं के साथ छलावा नही है?

भोपाल में प्रज्ञा ठाकुर की स्पष्ठ दिख रही हार एवं प्रज्ञा के बयानों व अंतिम चरण के चुनावी गणित के बिगड़ने की वजह से बीजेपी ने घड़ियाली आंसू बहाते हुए उन्हें नोटिस दिया है। एक ही तरह के अपराध की दो अलग सज़ा कैसे हो सकती है। मध्यप्रदेश बीजेपी के संचार विभाग के प्रमुख अनिल सौमित्र को महात्मा गांधी जी को पाकिस्तान का राष्ट्रपिता कहे जाने पर बीजेपी ने उन्हें तत्काल पार्टी से निष्काषित कर दिया और महात्मा गांधी के हत्यारे को देशभक्त कहने पर प्रज्ञा ठाकुर को सिर्फ नोटिस दिया। बीजेपी की मंशा महात्मा गांधी जी को सच्ची और वास्तविक श्रद्धांजलि देने की होती तो नोटिस देने की बजाय परिणाम आने से पहले प्रज्ञा ठाकुर को बर्खास्त कर देती और प्रज्ञा के चुनाव नामांकन रद्द करवाने की प्रक्रिया अपनाती। ये दोहरापन ही बीजेपी का असली चाल, चरित्र और चेहरा है।

भागदौड़ भरी ज़िन्दगी आख़िर कब तक?

कल मैं दुकान से जल्दी घर चला आया। आम तौर पर रात में 9बजे के बाद आता हूं, कल 8 बजे ही चला आया।

सोचा था घर जाकर थोड़ी देर पत्नी से बातें करूंगा, फिर कहूंगा कि कहीं बाहर खाना खाने चलते हैं। बहुत साल पहले, , हम ऐसा करते थे।

घर आया तो पत्नी टीवी देख रही थी। मुझे लगा कि जब तक वो ये वाला सीरियल देख रही है, मैं कम्यूटर पर कुछ मेल चेक कर लूं। मैं मेल चेक करने लगा, कुछ देर बाद पत्नी चाय लेकर आई, तो मैं चाय पीता हुआ दुकान के काम करने लगा।

अब मन में था कि पत्नी के साथ बैठ कर बातें करूंगा, फिर खाना खाने बाहर जाऊंगा, पर कब 8 से 11 बज गए, पता ही नहीं चला।

पत्नी ने वहीं टेबल पर खाना लगा दिया, मैं चुपचाप खाना खाने लगा। खाना खाते हुए मैंने कहा कि खा कर हम लोग बाहर गली मे टहलने चलेंगे, गप करेंगे। पत्नी खुश हो गई।

हम खाना खाते रहे, इस बीच मेरी पसंद की न्यूज टी वी पर आने लगी और मैं खाते-खाते टी वी  में डूब गया। टी वी  देखते हुए सोफा पर ही मैं सो गया था।

जब नींद खुली तब आधी रात हो चुकी थी।
बहुत अफसोस हुआ। मन में सोच कर घर आया था कि जल्दी आने का फायदा उठाते हुए आज कुछ समय पत्नी के साथ बिताऊंगा। पर यहां तो शाम क्या आधी रात भी निकल गई।

ऐसा ही होता है, ज़िंदगी में। हम सोचते कुछ हैं, होता कुछ है। हम सोचते हैं कि एक दिन हम जी लेंगे, पर हम कभी नहीं जीते। हम सोचते हैं कि एक दिन ये कर लेंगे, पर नहीं कर पाते।

आधी रात को सोफे से उठा, हाथ मुंह धो कर बिस्तर पर आया तो पत्नी सारा दिन के काम से थकी हुई सो गई थी। मैं चुपचाप बेडरूम में कुर्सी पर बैठ कर कुछ सोच रहा था।

पैतीस साल पहले इस लड़की से मैं पहली बार शादी के दिन ही मिला था। गुलाबी रंग के सुट  में मुझे मिली थी। फिर मैने इससे शादी के वक्त सात वचन दिए थे और लिए थे। मैंने वादा किया था कि सुख में, दुख में ज़िंदगी के हर मोड़ पर मैं तुम्हारे साथ रहूंगा।

पर ये कैसा साथ? मैं सुबह जागता हूं अपने काम में व्यस्त हो जाता हूं। वो सुबह जागती है मेरे लिए चाय बनाती है। चाय पीकर मैं कम्यूटर पर संसार से जुड़ जाता हूं, वो नाश्ते की तैयारी करती है। फिर हम दोनों अपने अपने काम में लग जाते हैं, मैं दुकान के लिए तैयार होता हूं, वो मेरे लिए लंच का इंतज़ाम करती है। फिर हम दोनों भविष्य के काम में लग जाते हैं।

मैं एकबार दुकान चला गया, तो इसी बात में अपनी शान समझता हूं कि मेरे बिना मेरा दुकान का काम नहीं चलता, वो अपना काम करके डिनर की तैयारी करती है।

देर रात मैं घर आता हूं और खाना खाते हुए ही निढाल हो जाता हूं। एक पूरा दिन खर्च हो जाता है, जीने की तैयारी में।

वो पंजाबी सुट वाली लड़की मुझ से कभी शिकायत नहीं करती। क्यों नहीं करती मैं नहीं जानता। पर मुझे खुद से शिकायत है। आदमी जिससे सबसे ज्यादा प्यार करता है, सबसे कम उसी की परवाह करता है। क्यों?

कई दफा लगता है कि हम खुद के लिए अब काम नहीं करते। हम किसी अज्ञात भय से लड़ने के लिए काम करते हैं। हम जीने के पीछे ज़िंदगी बर्बाद करते हैं।

कल से मैं सोच रहा हूं, वो कौन सा दिन होगा जब हम जीना शुरू करेंगे। क्या हम गाड़ी, टीवी, फोन, कम्यूटर, कपड़े खरीदने के लिए जी रहे हैं?

मैं तो सोच ही रहा हूं, आप भी सोचिए

कि ज़िंदगी बहुत छोटी होती है। उसे यूं जाया मत कीजिए। अपने प्यार को पहचानिए। उसके साथ समय बिताइए। जो अपने माँ बाप भाई बहन सगे संबंधी सब को छोड़ आप से रिश्ता जोड़ आपके सुख-दुख में शामिल होने का वादा किया उसके सुख-दुख को पूछिए तो सही।

एक दिन अफसोस करने से बेहतर है, सच को आज ही समझ लेना कि ज़िंदगी मुट्ठी में रेत की तरह होती है। कब मुट्ठी से वो निकल जाएगी, पता भी नहीं चलेगा।

माँ की नसीहत बेटी के काम आई। उजड़ने से बचा घर।

सुबह सुबह मिया बीवी का झगड़ा हो गया।

बीवी गुस्से मे बोली - बस, बहुत कर लिया बरदाश्त, अब एक मिनट भी तुम्हारे साथ नहीं रह सकती।

पति भी गुस्से मे था, बोला "मैं भी तुम्हें झेलते झेलते तंग आ चुका हुं।

पति गुस्से में ही दफ्तर चले गया। पत्नी ने अपनी मां को फ़ोन किया और बताया के वो सब छोड़ छाड़ कर बच्चों समेत मायके आ रही है, अब और ज़्यादा नहीं रह सकती इस जहन्नुम में।

मां ने कहा - बेटी बहु बन के आराम से वहीं बैठ, तेरी बड़ी बहन भी अपने पति से लड़कर आई थी, और इसी ज़िद्द में तलाक लेकर बैठी हुई है, अब तुने वही ड्रामा शुरू कर दिया है, ख़बरदार जो तुने इधर कदम भी रखा तो... सुलह कर ले पति से, वो इतना बुरा भी नहीं है।

मां ने लाल झंडी दिखाई तो बेटी के होश ठिकाने आ गए और वो फूट फूट कर रो दी, जब रोकर थकी तो दिल हल्का हो चुका था।

पति के साथ लड़ाई का सीन सोचा तो अपनी खुद की भी काफ़ी गलतियां नज़र आई।

मुँह हाथ धोकर फ्रेश हुई और पति के पसंद की डिश बनाना शुरू कर दी, और साथ स्पेशल खीर भी बना ली, सोचा कि शाम को पति से माफ़ी मांग लूँगी, अपना घर फिर भी अपना ही होता है। पति शाम को जब घर आया तो पत्नी ने उसका अच्छे से स्वागत किया, जैसे सुबह कुछ हुआ ही ना हो पति को भी हैरत हुई। खाना खाने के बाद पति जब खीर खा रहा था तो बोला डिअर, कभी कभार मैं भी ज़्यादती कर जाता हुं, तुम दिल पर मत लिया करो, इंसान हूँ गुस्सा आ ही जाता है"।

पति पत्नी का शुक्रिया अदा कर रहा था, और पत्नी दिल ही दिल मे अपनी मां को दुआएं दे रही थी, जिसकी सख़्ती ने उसको अपना फैसला बदलने पर मजबूर किया था, वरना तो जज़्बाती फैसला घर तबाह कर देता।

अगर माँ-बाप अपनी शादीशुदा बेटी की हर जायज़ नाजायज़ बात को सपोर्ट करना बंद कर दे तो रिश्ते बच जाते है।

भागदौड़ भरी ज़िन्दगी आख़िर कब तक?

कल मैं दुकान से जल्दी घर चला आया। आम तौर पर रात में 9बजे के बाद आता हूं, कल 8 बजे ही चला आया।

सोचा था घर जाकर थोड़ी देर पत्नी से बातें करूंगा, फिर कहूंगा कि कहीं बाहर खाना खाने चलते हैं। बहुत साल पहले, , हम ऐसा करते थे।

घर आया तो पत्नी टीवी देख रही थी। मुझे लगा कि जब तक वो ये वाला सीरियल देख रही है, मैं कम्यूटर पर कुछ मेल चेक कर लूं। मैं मेल चेक करने लगा, कुछ देर बाद पत्नी चाय लेकर आई, तो मैं चाय पीता हुआ दुकान के काम करने लगा।

अब मन में था कि पत्नी के साथ बैठ कर बातें करूंगा, फिर खाना खाने बाहर जाऊंगा, पर कब 8 से 11 बज गए, पता ही नहीं चला।

पत्नी ने वहीं टेबल पर खाना लगा दिया, मैं चुपचाप खाना खाने लगा। खाना खाते हुए मैंने कहा कि खा कर हम लोग बाहर गली मे टहलने चलेंगे, गप करेंगे। पत्नी खुश हो गई।

हम खाना खाते रहे, इस बीच मेरी पसंद की न्यूज टी वी पर आने लगी और मैं खाते-खाते टी वी  में डूब गया। टी वी  देखते हुए सोफा पर ही मैं सो गया था।

जब नींद खुली तब आधी रात हो चुकी थी।
बहुत अफसोस हुआ। मन में सोच कर घर आया था कि जल्दी आने का फायदा उठाते हुए आज कुछ समय पत्नी के साथ बिताऊंगा। पर यहां तो शाम क्या आधी रात भी निकल गई।

ऐसा ही होता है, ज़िंदगी में। हम सोचते कुछ हैं, होता कुछ है। हम सोचते हैं कि एक दिन हम जी लेंगे, पर हम कभी नहीं जीते। हम सोचते हैं कि एक दिन ये कर लेंगे, पर नहीं कर पाते।

आधी रात को सोफे से उठा, हाथ मुंह धो कर बिस्तर पर आया तो पत्नी सारा दिन के काम से थकी हुई सो गई थी। मैं चुपचाप बेडरूम में कुर्सी पर बैठ कर कुछ सोच रहा था।

पैतीस साल पहले इस लड़की से मैं पहली बार शादी के दिन ही मिला था। गुलाबी रंग के सुट  में मुझे मिली थी। फिर मैने इससे शादी के वक्त सात वचन दिए थे और लिए थे। मैंने वादा किया था कि सुख में, दुख में ज़िंदगी के हर मोड़ पर मैं तुम्हारे साथ रहूंगा।

पर ये कैसा साथ? मैं सुबह जागता हूं अपने काम में व्यस्त हो जाता हूं। वो सुबह जागती है मेरे लिए चाय बनाती है। चाय पीकर मैं कम्यूटर पर संसार से जुड़ जाता हूं, वो नाश्ते की तैयारी करती है। फिर हम दोनों अपने अपने काम में लग जाते हैं, मैं दुकान के लिए तैयार होता हूं, वो मेरे लिए लंच का इंतज़ाम करती है। फिर हम दोनों भविष्य के काम में लग जाते हैं।

मैं एकबार दुकान चला गया, तो इसी बात में अपनी शान समझता हूं कि मेरे बिना मेरा दुकान का काम नहीं चलता, वो अपना काम करके डिनर की तैयारी करती है।

देर रात मैं घर आता हूं और खाना खाते हुए ही निढाल हो जाता हूं। एक पूरा दिन खर्च हो जाता है, जीने की तैयारी में।

वो पंजाबी सुट वाली लड़की मुझ से कभी शिकायत नहीं करती। क्यों नहीं करती मैं नहीं जानता। पर मुझे खुद से शिकायत है। आदमी जिससे सबसे ज्यादा प्यार करता है, सबसे कम उसी की परवाह करता है। क्यों?

कई दफा लगता है कि हम खुद के लिए अब काम नहीं करते। हम किसी अज्ञात भय से लड़ने के लिए काम करते हैं। हम जीने के पीछे ज़िंदगी बर्बाद करते हैं।

कल से मैं सोच रहा हूं, वो कौन सा दिन होगा जब हम जीना शुरू करेंगे। क्या हम गाड़ी, टीवी, फोन, कम्यूटर, कपड़े खरीदने के लिए जी रहे हैं?

मैं तो सोच ही रहा हूं, आप भी सोचिए

कि ज़िंदगी बहुत छोटी होती है। उसे यूं जाया मत कीजिए। अपने प्यार को पहचानिए। उसके साथ समय बिताइए। जो अपने माँ बाप भाई बहन सगे संबंधी सब को छोड़ आप से रिश्ता जोड़ आपके सुख-दुख में शामिल होने का वादा किया उसके सुख-दुख को पूछिए तो सही।

एक दिन अफसोस करने से बेहतर है, सच को आज ही समझ लेना कि ज़िंदगी मुट्ठी में रेत की तरह होती है। कब मुट्ठी से वो निकल जाएगी, पता भी नहीं चलेगा।

भागदौड़ भरी ज़िन्दगी आख़िर कब तक?

कल मैं दुकान से जल्दी घर चला आया। आम तौर पर रात में 9बजे के बाद आता हूं, कल 8 बजे ही चला आया।

सोचा था घर जाकर थोड़ी देर पत्नी से बातें करूंगा, फिर कहूंगा कि कहीं बाहर खाना खाने चलते हैं। बहुत साल पहले, , हम ऐसा करते थे।

घर आया तो पत्नी टीवी देख रही थी। मुझे लगा कि जब तक वो ये वाला सीरियल देख रही है, मैं कम्यूटर पर कुछ मेल चेक कर लूं। मैं मेल चेक करने लगा, कुछ देर बाद पत्नी चाय लेकर आई, तो मैं चाय पीता हुआ दुकान के काम करने लगा।

अब मन में था कि पत्नी के साथ बैठ कर बातें करूंगा, फिर खाना खाने बाहर जाऊंगा, पर कब 8 से 11 बज गए, पता ही नहीं चला।

पत्नी ने वहीं टेबल पर खाना लगा दिया, मैं चुपचाप खाना खाने लगा। खाना खाते हुए मैंने कहा कि खा कर हम लोग बाहर गली मे टहलने चलेंगे, गप करेंगे। पत्नी खुश हो गई।

हम खाना खाते रहे, इस बीच मेरी पसंद की न्यूज टी वी पर आने लगी और मैं खाते-खाते टी वी  में डूब गया। टी वी  देखते हुए सोफा पर ही मैं सो गया था।

जब नींद खुली तब आधी रात हो चुकी थी।
बहुत अफसोस हुआ। मन में सोच कर घर आया था कि जल्दी आने का फायदा उठाते हुए आज कुछ समय पत्नी के साथ बिताऊंगा। पर यहां तो शाम क्या आधी रात भी निकल गई।

ऐसा ही होता है, ज़िंदगी में। हम सोचते कुछ हैं, होता कुछ है। हम सोचते हैं कि एक दिन हम जी लेंगे, पर हम कभी नहीं जीते। हम सोचते हैं कि एक दिन ये कर लेंगे, पर नहीं कर पाते।

आधी रात को सोफे से उठा, हाथ मुंह धो कर बिस्तर पर आया तो पत्नी सारा दिन के काम से थकी हुई सो गई थी। मैं चुपचाप बेडरूम में कुर्सी पर बैठ कर कुछ सोच रहा था।

पैतीस साल पहले इस लड़की से मैं पहली बार शादी के दिन ही मिला था। गुलाबी रंग के सुट  में मुझे मिली थी। फिर मैने इससे शादी के वक्त सात वचन दिए थे और लिए थे। मैंने वादा किया था कि सुख में, दुख में ज़िंदगी के हर मोड़ पर मैं तुम्हारे साथ रहूंगा।

पर ये कैसा साथ? मैं सुबह जागता हूं अपने काम में व्यस्त हो जाता हूं। वो सुबह जागती है मेरे लिए चाय बनाती है। चाय पीकर मैं कम्यूटर पर संसार से जुड़ जाता हूं, वो नाश्ते की तैयारी करती है। फिर हम दोनों अपने अपने काम में लग जाते हैं, मैं दुकान के लिए तैयार होता हूं, वो मेरे लिए लंच का इंतज़ाम करती है। फिर हम दोनों भविष्य के काम में लग जाते हैं।

मैं एकबार दुकान चला गया, तो इसी बात में अपनी शान समझता हूं कि मेरे बिना मेरा दुकान का काम नहीं चलता, वो अपना काम करके डिनर की तैयारी करती है।

देर रात मैं घर आता हूं और खाना खाते हुए ही निढाल हो जाता हूं। एक पूरा दिन खर्च हो जाता है, जीने की तैयारी में।

वो पंजाबी सुट वाली लड़की मुझ से कभी शिकायत नहीं करती। क्यों नहीं करती मैं नहीं जानता। पर मुझे खुद से शिकायत है। आदमी जिससे सबसे ज्यादा प्यार करता है, सबसे कम उसी की परवाह करता है। क्यों?

कई दफा लगता है कि हम खुद के लिए अब काम नहीं करते। हम किसी अज्ञात भय से लड़ने के लिए काम करते हैं। हम जीने के पीछे ज़िंदगी बर्बाद करते हैं।

कल से मैं सोच रहा हूं, वो कौन सा दिन होगा जब हम जीना शुरू करेंगे। क्या हम गाड़ी, टीवी, फोन, कम्यूटर, कपड़े खरीदने के लिए जी रहे हैं?

मैं तो सोच ही रहा हूं, आप भी सोचिए

कि ज़िंदगी बहुत छोटी होती है। उसे यूं जाया मत कीजिए। अपने प्यार को पहचानिए। उसके साथ समय बिताइए। जो अपने माँ बाप भाई बहन सगे संबंधी सब को छोड़ आप से रिश्ता जोड़ आपके सुख-दुख में शामिल होने का वादा किया उसके सुख-दुख को पूछिए तो सही।

एक दिन अफसोस करने से बेहतर है, सच को आज ही समझ लेना कि ज़िंदगी मुट्ठी में रेत की तरह होती है। कब मुट्ठी से वो निकल जाएगी, पता भी नहीं चलेगा।

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