Saturday, May 18, 2019

गाँधी क्यों बेचारे रहें। बनना चाहिए क़ानून।

                  जिस तरह रोज़-रोज़ हर कोई एरा गैरा मुँह उठाये भारत के सर्वमान्य राष्टपिता मोहनदास करमचंद गाँधी पर टिप्पणी कर अपनी राजनैतिक महत्वाकांक्षा पूरी करने में लगा रहता है। क्या यह सम्मानजनक है। मेरी दृष्टि में कदापि नहीं!
                  यह हमारे लिए बड़े शर्म की बात है कि हमने भारत के राष्ट्रपति को तो आदर सूचक दायरे में ले लिए हैं, इनके लिए हम "महामहिम" शब्द का उपयोग करते हैं किंतु आदिकाल से चिर स्थायी रहने वाला सम्बोधन "राष्ट्रपिता" शब्द के लिए अभी तक कोई भी क़ानून हम नहीं बना पाये हैं।
                  राष्ट्रपिता शब्द को कुछ निहित स्वार्थी तत्वों ने धूल-धूसरित करते रहने का प्रण कर लिया है। जबकि बैरिस्टर मोहनदास करमचंद गांधी "बापू" हमारी आन-बान और शान हैं। "महात्मा" जैसा महान गरिमा और सम्माननीय शब्द युगों युगों तक केवल "बापू" जैसे व्यक्तित्व के लिए ही गढ़ा जाता है, किसी तुच्छ सड़कछाप बकलोल के लिए नहीं।
                   आज भारत के लोकसभा चुनाव सम्पन्न हुए। सरकार चाहे जिस भी दल की बने किन्तु हमारी अस्मिता के प्रतीक "बापू" की मर्यादा के लिए संसद में कठोरतम क़ानून बनना ही चाहिए ताकि अब से किसी भी छुटभैये की राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को अपमानित करने की हिम्मत न हो सके।
                   क़ानून में यह भी प्रावधान हो कि यदि कोई व्यक्ति राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के सम्मान में किसी भी प्रकार के अमर्यादित शब्दों का प्रयोग करता है तथापि वह किसी सत्ताधारी दल या किसी राजनैतिक दल से सम्बद्ध हो तब उस दल के नेता के विरुद्ध भी दण्डात्मक कार्यवाही होनी चाहिये। अपनी बात कहने की स्वतंत्रता के कदापि यह मायने नहीं कि कोई भी हमारी राष्ट्रीय गरिमा के लिये कुछ भी अनाप-शनाप बकलोली करे।

दोस्तों यह मेरे अपने विचार हैं, यदि आप सहमत हैं तब मेरी यह पोस्ट ज़रूर अपने सभी सोशल मीडिया पर शेयर कीजिये।

सैयद महमूद अली चिश्ती सीनियर जर्नलिस्ट, यूट्यूबर, ब्लॉगर, सोशल मीडिया एक्सपर्ट, आरटीआई एक्टिविस्ट।
chishtimahmood786@gmail.com

भक्त, फ़क़ीर और मज़ार।

किसी मज़ार पर एक फकीर रहते थे।
सैकड़ों भक्त उस मज़ार पर आकर दान-दक्षिणा चढ़ाते थे।

उन भक्तों में एक बंजारा भी था।

वह बहुत गरीब था,

फिर भी, नियमानुसार आकर माथा टेकता,

फकीर की सेवा करता,
और
फिर अपने काम पर जाता,
उसका कपड़े का व्यवसाय था,
कपड़ों की भारी पोटली कंधों पर लिए सुबह से लेकर शाम तक गलियों में फेरी लगाता,
कपड़े बेचता।

एक दिन उस फकीर को उस
पर दया आ गई,
उसने अपना गधा उसे भेंट कर दिया।

अब तो बंजारे की आधी समस्याएं हल हो गईं।
वह सारे कपड़े गधे पर लादता और जब थक जाता
तो
खुद भी गधे पर बैठ जाता।

यूं ही कुछ महीने बीत गए,,

एक दिन गधे की मृत्यु हो गई।

बंजारा बहुत दुखी हुआ,
उसने उसे उचित स्थान पर दफनाया,
उसकी कब्र बनाई
और
फूट-फूट कर रोने लगा।

समीप से जा रहे किसी व्यक्ति ने
जब यह दृश्य देखा,
तो सोचा
जरूर किसी संत की मज़ार होगी।
तभी यह
बंजारा यहां बैठकर अपना दुख रो रहा है।
यह सोचकर उस व्यक्ति ने कब्र पर
माथा टेका और अपनी मन्नत हेतु वहां प्रार्थना की कुछ पैसे चढ़ाकर वहां से चला गया।

कुछ दिनों के उपरांत ही उस
व्यक्ति की कामना पूर्ण हो गई। उसने
खुशी के मारे सारे गांव में
डंका बजाया कि अमुक स्थान पर एक पूर्ण फकीर की मज़ार है।
वहां जाकर जो अरदास करो वह पूर्ण होती है।
मनचाही मुरादे बख्शी जाती हैं वहां।

उस दिन से उस कब्र पर
भक्तों का तांता लगना शुरू हो गया।

दूर-दराज से भक्त अपनी मुरादे बख्शाने वहां आने लगे।
बंजारे की तो चांदी हो गई,

बैठे-बैठे उसे कमाई
का साधन मिल गया था।

एक दिन वही फकीर
जिन्होंने बंजारे
को अपना गधा भेंट स्वरूप
दिया था वहां से गुजर रहे थे।

उन्हें देखते ही बंजारे ने उनके चरण पकड़ लिए और बोला-
"आपके गधे ने
तो मेरी जिंदगी बना दी। जब तक जीवित था
तब तक मेरे रोजगार में मेरी मदद करता था
और
मरने के बाद
मेरी जीविका का साधन बन
गया है।"

फकीर हंसते हुए बोले,
"बच्चा!
जिस मज़ार
पर तू नित्य माथा टेकने आता था,

वह मज़ार इस गधे की मां की थी।"

बस यूही चल रहा है मेरा भारत महान।

        Its,  Incredible India.
😝😝😝😝😝😝😝😝o

महंगे होते आम चुनाव: लगाम लगनी चाहिए।

               पता नहीं आंकड़ा सही है या गलत लेकिन एक चैनल पर भारत में इस बार हुए आमचुनाव का खर्च देखर मेरी नींद उड़ गयी .खबर कहती है की भारत में 2019  के आम चुनाव पर 60  हजार करोड़ से अधिक का खर्च हुआ है और इसके साथ ही चुनाव खर्च के मामले में भारत दुनिया में नंबर एक पर पहुँच गया है .याद रखिये की भारत में इस समय 90 करोड़ मतदाता हैं।
              भारत में चुनाव लगातार मंहगे होते जा रहे हैं। चुनावों के लिए अंधाधुंध खर्च ने इस लोकतांत्रिक प्रक्रिया को आमजनता के हाथों के काबू से बाहर कर दिया है। दस साल पहले पंद्रहवीं लोकसभा के लिए देश में करीब 10  हजार करोड़ रूपये के खर्च का अनुमान था जबकि दुनिया के सबसे महाबली अमरीका में ये खर्च 8 हजार करोड़ तक सीमित था लेकिन 2014 के आम चुनाव में भाजपा ने चुनाव में इतना पैसा डाला की देखते ही देखते आज ये खर्च 60 हजार करोड़ रूपये तक पहुँच गया है।
                आंकड़े गवाह हैं कि भारत में बीते 62 साल में चुनाव खर्च में 370  गुना का इजाफा हुआ है। ये आंकड़े सरकारी हैं लेकिन गैर सरकारी आंकड़े बताते हैं कि चुनावों में काले धन की आमद चुनाव आयोग की तथाकथित सख्ती के बाद लगातार बढ़ी है यानि की पांच साल में ही ये खर्च 40 गुना बढ़ गया है। जाहिर है कि सत्ता में बने रहने के लिए लम्बे इन्तजार के बाद कामयाब हुई भाजपा इसके लिए दोषी है। दोषी तो कांग्रेस भी कम नहीं है लेकिन हाल के पांच साल चुनावों का खर्च बढ़ाने के मामले में अपने सभी पिछले कीर्तिमान तोड़ने वाले माने जा रहे हैं।
             चुनाव जीतने के लिए मैदानी खर्च के अलावा सोशल मीडिया, टीवी, अख़बार विज्ञापन और चुनावी दौरों के लिए की जाने वाली हवाई यात्राओं के कारण बढ़ा है। रोड शो भी इस खर्च का एक बड़ा कारण हैं लेकिन कोई भी राजनितिक दल चुनावों को सस्ता बनाने की बात नहीं करता। यहां तक कि चुनाव आयोग जो इस साल केंचुआ के नाम से बदनाम हुआ है हर चुनाव में खर्च की सीमा बढ़ाता चला जा रहा है। किसी को फ़िक्र नहीं हैं कि लगातार महंगे होते चुनाव में आम आदमी के लिए जगह कहाँ बचेगी ?
             नई दिल्ली स्थित सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज़ (सीएमएस) के अनुसार इस बार 11 अप्रैल को शुरू होकर 19 मई को संपन्न मतदान की प्रक्रिया पर 500 अरब रुपये (7 अरब डॉलर) की अभूतपूर्व लागत आएगी। अमेरिकी राजनीति में धन के इस्तेमाल पर नज़र रखने वाली संस्था ओपेन सीक्रेट्स डॉट ऑर्ग के अनुसार 2016 में अमेरिका के राष्ट्रपतीय और संसदीय (कांग्रेस के) चुनाव पर करीब 6.5 अरब डॉलर खर्च हुए थे। सीएमएस का खर्च का अनुमान भारत के 2014 के संसदीय चुनाव के 5 अरब डॉलर के मुकाबले 40 फीसदी अधिक है और यह आंकड़ा प्रति वोटर लगभग 8 डॉलर यानि 560  रुपया का बैठता है।         
             उल्लेखनीय है कि भारत की 60 फीसदी जनता रोजाना करीब 3 डॉलर यानि 210 रूपये की आमदनी पर गुजर-बसर करती है। अध्ययनकर्ताओं का अनुमान है कि सोशल मीडिया पर चुनावी खर्च में भारी उछाल देखी जा सकती है, और 2014 के 2.5 अरब रुपये के मुकाबले इस बार यह खर्च 50 अरब डॉलर के स्तर को छू लेगा।
अगर आप अंधभक्त नहीं हैं तो यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, बर्कले के सहायक प्रोफेसर जेनिफर बसेल द्वारा किए गए एक सर्वे पर भरोसा कीजिये। वे कहते हैं कि भारत के केंद्रीय स्तर के 90 प्रतिशत से अधिक नेता मानते हैं  कि उनके जैसे नेता नकदी, शराब या व्यक्तिगत उपयोग के सामान उपहार में देने का दबाव महसूस करते हैं। देश के कुछ हिस्सों में मतदाताओं के बीच ब्लेंडर्स, टेलीविजन सेट और कभी-कभार बकरियां भी उपहार के रूप में वितरित की जाती हैं। चुनाव आयोग ने पिछले साल कर्नाटक में हुए चुनाव के दौरान 1.3 अरब रुपये से अधिक की बेनामी नकदी, सोना, शराब और ड्रग्स बरामद किए गए थे। चुनाव पर होने वाले अधिकांश खर्च को सार्वजनिक रूप से जाहिर नहीं किया जाता है। जहां उम्मीदवारों के चुनावी खर्च के लिए कानून द्वारा एक सीमा तय है, पार्टियां बेहिसाब खर्च कर सकती हैं। हालांकि देश के बड़े राजनीतिक दलों ने मार्च 2018 में समाप्त वर्ष में कुल मिलाकर मात्र 13 अरब रुपये की आय दिखाई है।
               देश की संसद यदि दिनोंदिन बढ़ते चुनाव खर्च पर लगाम नहीं लगाएगी तो वो दिन दूर नहीं होगा जब चुनाव केवल अरबपति और करोड़पति लोग ही लड़ पाएंगे और देश की संसद में आम आदमी का कोई नुमाइंदा नहीं होगा .ऐसे में देश की तस्वीर कैसी होगी आप कल्पना कर सकते हैं।

Friday, May 17, 2019

अवनीश कुमार कलेक्टर रायगढ़ छत्तीसगढ़: बेमिसाल शख्सियत।

सच्चाई से नही भागे,यह किसी न्यूज़ से लिया गया है
प्रमाणित-------
पिछले सप्ताह CBSE और ICSE बोर्ड ने परिक्षा के परिणाम घोषित किए, साथ ही साथ कई राज्यों के बोर्ड के भी परिणाम बीते दिनों में आए हैं. सोशल मीडिया अच्छे मार्क्स के बधाई पोस्ट से भरा हुआ था. 

छत्तीसगढ़ के रायगढ़ ज़िले में एक 18 साल का छात्र ने बोर्ड की परिक्षा में फ़ेल होने की वजह से ख़ुदकुशी कर ली. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, वो छात्र पिछले साल भी फ़ेल हुआ था. 

इस ख़बर से दुखी होकर एक 2009 बैच के IAS अधिकारी अवनीश कुमार शरण, जो कि वर्तमान में छत्तीसगढ़ के कबीरधाम ज़िले के मजिस्ट्रेट हैं. उन्होंने फ़ेसबुके पोस्ट के उन छात्रों के लिए एक मार्मिक संदेश लिखा, जो परिक्षा के परिणाम से निराश हो जाते हैं. 

उन्होंने लिखा, 'आज मैंने एक अख़बार में एक दुखद ख़बर पढ़ी कि एक छात्र ने परिक्षा के परिणाम में मनमुताबिक नंबर नहीं पाने की वजह से ख़ुदकुशी कर ली. मैं सभी छात्रों और उनके माता-पिता से अपील करता हूं कि रिज़ल्ट को ज़्यादा सीरियसली मत लीजिए, ये सिर्फ़ संख्या का खेल है. आपको भविष्य में ऐसे कई मौके मिलेंगे जहां आप अपनी काबीलियत साबित कर सकते हैं.' 

अवनीश कुमार ने अपना उदाहरण सामने रखते हुए लिखा कि उन्हें दसवीं में 44.5%, बारहवीं में 65% और स्नातक में 60.7% नंबर मिले थे. इसके बावजूद उन्हें बहुत मुश्किल मानी जाने वाली UPSC की परीक्षा क्लियर की और आज वो IAS अधिकारी हैं. 

Source: Facebook
छत्तीसगढ़ बोर्ड ने 11 मई को अपने परिणाम घोषित किए थे, कम नंबर पाने वाले छात्र हताश न हों और उनके भीतर का आत्मविश्वास कमज़ोर न पड़े इसलिए अवनीश कुमार ने ये पोस्ट लिखी थी. 

खास बातचीत :-  IAS अधिकारी ने कहा, 'आज कई रास्ते मौजूद हैं, मौके आते रहते हैं. स्कूल के परिणाम आपका भविष्य निर्धारित नहीं कर सकते. उन्हें समझना होगा कि परिक्षाओं के परिणाम आखिरी रास्ता नहीं हैं.'

Thursday, May 16, 2019

औरत बेमिसाल। सेहरी से अफ्तार तक।

औरत सेहरी में सब से पहले जागती है, और सब घर वालों के लिए सेहरी तैयार करती है ।
लेकिन सब से आख़िर में खाती है ।
रोज़ा रखने के बाद दोपहरी में बच्चों को खाना खिलाती है।

फिर 4 बजे के बाद से इफ़्तयारी तक अपने खानदान वालों के लिए इफ़्तयारी तैयार करने में लग जाती है ।
चावल, पालक, गोशत, चटनी वगैरह तैयार करती है और साथ में यह डर भी रहता है कि पता नही कैसा पका होगा।

सास और ससर के लिए अलग चीज़े पकाती है ।
और साथ साथ में इफ़्तयारी से पहले शौहर के गुस्से को सब्र से झेलना भी पड़ता है ।
तारीफ तो दूर की बात । 2-2 रोटियाँ खाने के बाद एक ठंडा ग्लास लस्सी मांगना और कहना कि नमक कम है औऱ खास ठंडा नहीं है।

और इफ़्तयारी भी पूरी की पूरी कर ली जनाब ने।
और वो चुपके से किसी कमरे में इफ़्तयारी करती है ।
तरावीह के बाद पहर से हज़रात के लिए चाय और मेवे तैयार करने हैं।

और फिर से सेहरी में सब से पहले जागना है ।
अगर ख़ुदा न ख़स्ता नही जागी या लैट हो गयी तो सारे खानदान का गुस्सा बेचारी औरत पर गिरता है सारा दिन।

आप से दरख्वास्त है कि घर की सारी औरतें, ख्वाह वो माँ हो, बीवी हो, बेटी हो, बहन हो या कोई और रिश्ता हो। उनका लाज़मी ख्याल रखना चाहिए।
आखिर वो भी हमारी तरह इंसान है।

ख़ुदा को मानो, अब उस जहालत से निकलो । यह मा'शरती पसमान्दगी खत्म करो।

इसीलिए मुस्लिम 800 साल राज कर पाए।

इसीलिए मुस्लिम 800 साल राज कर पाए।

कुतुबुद्दीन ऐबक शिकार खेल रहे थे, तीर चलाया और जब शिकार के नज़दीक गए तो देखा कि एक नौजवान उनके  तीर से घायल गिरा पड़ा है।

कुछ ही पल में उस घायल नौजवान की मौत हो जाती है। पता करने पर मालूम हुआ कि वह पास के ही एक गाँव में रहने वाली बुजुर्ग का इकलौता सहारा था और जंगल से लकड़ियाँ चुन कर बेचता और जो मिलता उसी से अपना और अपनी माँ का पेट भरता था।

कुतुबुद्दीन उसकी माँ के पास गया, बताया कि उसके तीर से गलती से उसके बेटे की मौत हो गयी है. माँ रोते-रोते बेहोश हो गयी. फिर कुतुबुद्दीन ने खुद को क़ाज़ी के हवाले किया और अपना ज़ुर्म बताते हुए अपने खिलाफ मुकद्दमा चलाने की अर्ज़ी दी।

क़ाज़ी ने मुकदमा शुरू किया बूढ़ी माँ को अदालत में बुलाया और कहा कि तुम जो सज़ा कहोगी वही सज़ा इस मुज़रिम को दी जायेगी। वृद्धा ने कहा कि ऐसा बादशाह फिर कहाँ मिलेगा जो अपनी ही सल्तनत में अपने खिलाफ ही मुकदमा चलवाए और उस गलती के लिए जो उसने जानबूझ कर नहीं की।

आज से कुतुबुद्दीन ही मेरा बेटा है।
मैं इसे माफी देती हूँ।

क़ाज़ी ने कुतुबुद्दीन को बरी किया और कहा – ”अगर तुमने अदालत में ज़रा भी अपनी बादशाहत दिखाई होती तो मैं तुम्हें उस बुढ़िया के हवाले न करके खुद ही सख्त सज़ा देता।"

इस पर कुतुबुद्दीन ने अपनी कमर से खंज़र निकाल कर क़ाज़ी को दिखाते हुए कहा–''अगर तुमने मुझसे मुज़रिम की तरह व्यवहार न करके ज़रा भी मेरी बादशाहत का ख़याल किया होता तो मैं तुम्हें इसी खंज़र से मौत के घाट उतार देता।

ये है असल बादशाहत और ये है असल इन्साफ और यही है इस्लाम की तालीमl
                 
इस्लाम सिर्फ़ प्यार, मोहब्बत , भाईचारगी और इंसाफ़ की तालीम देता है।

सऊदी अरब का मक्का शहर। जानिए

"सऊदी अरब का मक्का शहर।"

आईये जानते हैं दुनिया के इस खूबसूरत शहर के बारे में।

सऊदी अरब के इस क़िस्मत वाले शहर में पैग़म्बर हज़रत मोहम्मद साहब का माँ आमना बीबी के यहाँ जन्म हुआ है।

सऊदी में पट्रोल डीजल तेल पैदा होता है और सोने के पहाड़ हैं।

मक्का दुनिया का एक अकेला एेसा शहर है ज़हां बाज़ार सब कुछ 24 घण्टे रात दिन खुला रहता है।

मक्का में ज़्यादातर खरीददारी ओरतें ही करती हैं मगर पर्दे में  रह कर फिर भी कभी यहाँ बलात्कार या छोटी मोटी छेड़छाड़ जैसी घटना भी नहीं होती हैं यहाँ रात दिन अौरतें अकेले बिना डर खौफ कहीं भी आ जा सकती हैं।

मक्का शहर का कूड़ा कचरा शहर से 70 किलोमीटर दूर पहाड़ियो में दबाया जाता है। दुनिया का सबसे बड़ा तीर्थ स्थल होने के बावजूद एक साथ लाखों हज य़ात्री आते  हैंउसके बाद भी मक्का साफ सफाई में दुनिया का न.1 शहर है।

मक्का पूरा पथरीला रेगिस्थान शहर होने के बावजूद यहां की जमीन में पानी की एक बूँद नहीं है फिर भी अल्लाह की कुदरत से ज़मज़म के एक कुएे से पूरे साल और पूरी दुनिया में ज़मज़म का पानी जाता है और यहाँ भी पूरे मक्का और सऊदी में प्रयोग किया जाता है और आज तक कभी कम नहीं हुआ है। सुब्हान अल्लाह ज़मज़म का पानी कभी खराब नहीं होता ज़मज़म के पानी में अल्लाह ने शिफा रखी है।

यहाँ हज़ारों तरह के खाने पकते हैं क्योकि मक्का सिर्फ दुनिया का एक एेसा शहर है जहाँ दुनिया के हर कोने से हर जगह से लाखों मुसलमान हज और उमरा के लिए ईकट्ठा होते हैं।

मक्का शहर में एक दिन में लाखों मुर्गियाँ-बकरे और अन्य गोश्त की खपत होती है।

मक्का की छाछ ज़िसका नाम (LEBAN) है वो full fat की होती है जैसा भारत का का दूध।

सऊदी और मक्का  में लाखों भारतीय, पकिस्तानी ,बंगलादेशी,मिस्री, यमन और लाखों अन्य मुल्कों के लोग काम करते हैं। सोचो अल्लाह यह7 से कितने लोगों के घर चला रहा है।

मक्का शहर में लाखों AC इस्तेमाल होते हैं। यहाँ हर कमरे में यहाँ तक के छोटी-सी-छोटी दुकान में भी AC लगा होता है।

मक्का में 6 और 8 सिलेन्डरो तक की कारे दोड़ती हैं।

यहाँ खजूर के सिवाय कोई फसल नहीं उगती फिर भी दुनिया की हर चीज फल सब्जी वगैरह बेमौसम यहाँ पर बिकती है। मक्का में 200 क्वालिटी की खजूर बिकती है और एक एेसी खजूर भी है उसमे गुठंली भी नहीं है।

मक्का में मिलने वाली अजवा ख़जूर दिल की सभी बीमारियों में अक्सीर दवा के रूप में उपयोग की जाती है।

पूरे सऊदी अरब में कोई नदी या तालाब नहीं फिर भी मक्का और सऊदी में पानी की कोई कमी नहीं है।

मक्का में  कोई बिजली लाइंन बाहर नहीं है सब ज़मीन के अन्दर है।

पूरे मक्का में कोई नाला या नाली नहीं है।

पूरा मक्का शहर पहाड़ी इलाके में है फिर भी रोड़ 4 लाइन, 6 लाइन, 8 लाइन,10 लाइन और 12 लाइन तक की सड़कें हैं और पहाड़ों के अन्दर जो सुरंगे बनी हुई हैं वो भी 6 लाइन 8 लाइन हैं।

दुनिया का सर्वश्रेस्ठ कपड़ा यहाँ बिकता है जबकी यहाँ बनता नहीं है।

सऊदी अरब की सरकार हर पढ़ने वाले बच्चे को 600 से 800 रियाल प्रतिमाह देती है जो इंडिया के 12 से 16 हजार रूपये होता है।

यहाँ विकास कार्य के लिये जो पैसा हुकूमत से मिलता है वो पूरा का पूरा खर्च किया जाता है।

यहां मुख्यतया जैतून, सुरजमुखी और मक्का (मकी -कुकड़ी) का तेल खाया जाता है।

यहाँ का कानून दुनिया का सर्वोत्तम इंसाफ करने वाला कानून है। यहाँ चोरी, लूट, हत्या, अपरहण जैसे कोई अपराध नहीं हैं।

सऊदी अरब में हरयाली नहीं है। पेड़ पौधे नहीं के बराबर हैं। मग़र सांस लेने में  कोई तकलीफ नहीं होती है। यहाँ पर वैज्ञानिक रिसर्च भी फैल है।

सउदी अरब में हर चीज बाहर से मंगाई1 जाती है फिर भी महंगाई नहीं  है।

सऊदी अरब में मंगाई जाने वाली ज़्यादातर चीज़ें मेरे मादर-ए-वतन हिन्दोस्तान से ही मंगाई जाती हैं।                                                                     

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मोदी की जीत भारतीय राजनैतिक चेतना का तीसरा सोपान है।

उनके लिए जिन्हें देश से प्रेम भी है और देश की फिक्र भी है मोदी की जीत भारतीय राजनैतिक चेतना का तीसरा सोपान है। पिछड़ों और दलितों की राजनीत...