Wednesday, May 15, 2019

इस भारी भरकम मतदान के मायने। चिंतनीय है।

इस भारी भरकम मतदान के मायने।

बेमौसम बरसात के कारण और उसके नतीजे की समीक्षा आसान है। नेताओं के यकायक सज्जन नजर आने की वजह भी चुटकियों में समझी जा सकती है। प्री-पोल और पोस्ट-पोल सर्वे के रूझानों के पीछे का खेल समझना भी बायें हाथ का खेल है। यहां तक कि कई लोग तो कुमार शाहनी और मणि कौल की फिल्मों को भी फिल्मों के रूप में समझा देने में सफल रहते हैं। लेकिन लोकसभा चुनाव में देश से हटकर मध्यप्रदेश के मतदाता को बूझ पाना इस बार काफी कठिन लग रहा है। क्योंकि उसने गर्मी को धता बताई। चुनावी पंडितों के अनुमानों को झुठला दिया। राजनीतिज्ञों को हतप्रभ कर दिया। उसने यह किया कि तीसरे चरण तक हर क्षेत्र में बीते लोकसभा चुनाव के मुकाबले भारी-भरकम मतदान कर दिया। लगभग पांच से लेकर पन्द्रह फीसदी तक ज्यादा वोट डलने का मतलब खोजना आसान नहीं है। मध्यप्रदेश में पांच से लेकर पंद्रह प्रतिशत तक अधिक मतदान मायनेखेज है। लेकिन इसके मायने क्या हैं, यह 23 मई को ही पता चल सकेगा। शायद एकाध सीट पर मामला सन 2014 के जैसा ही रहा। बाकी जगह मतदाता गर्मी से तो नहीं हांफा, लेकिन दनादन दबे अपने बटन के चलते ईवीएम जरूर हांफ गयी होगी। खास बात यह कि इन छह चरणों में पश्चिम बंगाल को छोड़कर देश के अन्य हिस्सों में मतदान का प्रतिशत (इसमें मध्यप्रदेश शामिल नहीं है) बीते चुनाव जैसा ही रहा है। तो आखिर मध्यप्रदेश में क्या हो रहा है? मतदान करने के चुनावी नारों को तो इसकी वजह माना नहीं जा सकता

सरकारी पैसे पर चल रहे किसी गैर सरकारी संगठन के नौटंकीनुमा जागरूकता अभियान को भी इसका कारण नहीं गिनाया जा सकता। हां, किसी अंडर करेंट फैक्टर से इसे जोड़कर देख सकते हैं। तो सवाल यह कि यह करंट किसका है और किसे लगेगा। कमलनाथ सरकार को लगेगा या इसकी जद में नरेंद्र मोदी आएंगे? दोनो को झटके लगने की अपनी-अपनी वजह हैं। दैवयोग से कमलनाथ इसके ज्यादा नजदीक दिखते हैं। उनके लिए इन झटकों की शुरूआत राज्य में 29 अप्रैल को हुए पहले चरण के मतदान के बाद ही हो गयी थी। नाथ का अपना सरकारी तंत्र है। चुनावी राजनीति का पुराना अनुभव है। कहीं न कहीं उन्हें यह भान हो ही गया होगा कि किसान की कर्ज माफी का अधूरा वादा बहुत कुछ असर दिखा रहा है। वरना और कोई वजह नहीं थी कि दूसरे चरण के बाद किसानों की कर्ज माफी को लेकर राजनीतिक घमासान यकायक तेज हो गया। कांग्रेसी जितनी शिद्दत से शिवराज के घर पर कर्ज माफी के तथाकथित सही आंकड़े मय दस्तावेज छोड़कर आये, उतनी ही शिद्दत से इनसे संबंधित आंकडेÞ अखबारों को भी उपलब्ध कराये गये। व्यग्रता का आलम यह कि आचार संहिता की चिंता छोड़कर नाथ को प्रेस कांफ्रेंस लेकर कर्ज माफी पर सरकार की स्थिति स्पष्ट करना पड़ गयी।  राज्य में पहले और दूसरे चरण के बाद नाथ की छटपटाहट बढ़ना स्वाभाविक थी। इससे पहले शायद वे दो बातों से मुतमईन थे। पहला, कर्ज माफी की दस दिन के भीतर प्रक्रिया शुरू करना उनके हक में रहेगा।

दूसरा, राहुल गांधी की सालाना 72 हजार रुपए वाली स्कीम के चलते कांग्रेस को और  लाभ मिलेगा। किंतु संभवत: आशा के यह दोनो स्तंभ भरभराते हुए गिरने लगे। क्योंकि वे रेत की बुनियाद पर खड़े थे। कर्ज माफी का वादा करते समय राहुल गांधी ने इफ एंड बट जैसी कोई स्थिति सामने नहीं रखी थी। जबकि सत्ता संभालते ही हुआ यह कि सरकार ने मार्च, 2018 तक के ही किसान कर्ज को इस माफी की परिधि में लिया। वह भी यह कहते हुए कि केवल फसल ऋण को माफ किया जाएगा। इसका असर यह हुआ कि सरकार के कई मंत्री तक बगावती झंडा उठाकर यह मांग करने लगे कि कम से कम दिसंबर, 2018 तक का कर्ज माफ किया जाए। खाली वाला खजाना तथा उतावली वाली घोषणा के बीच नाथ केवल यह कर पाए कि उन्होंने बैंकों में करीब 13 सौ करोड़ रूपए जमा किए। जबकि कर्ज माफी इससे कई हजार करोड़ रुपए ज्यादा की होना है। नतीजतन, ऋण माफी के नाम पर किसानों को 1200 से लेकर कुछ हजार रुपए तक का ही लाभ मिल सका। कई ऐसे किसान सामने आए, जिन्होंने कर्ज माफी की इस अधूरी प्रक्रिया के प्रति नाराजगी जतायी है।  तो क्या यह मान लें कि मध्यप्रदेश में हो रही यह बम्पर वोटिंग राज्य सरकार के खिलाफ विशेषत: किसानों के गुस्से का नतीजा है? या फिर यह कमलनाथ सरकार ने जैसा वो दावा कर रही है कि संकल्प पत्र के जिन वचनों को उसने पूरा कर दिया है यह उसके प्रति लोगों का समर्थन है। लोगों में आक्रोश तो दनादन हो रही बिजली कटौती को लेकर भी है।

भोपाल में जहां पांच दशक बाद मतदान प्रतिशत ने साठ का आंकडा पार किया है, वहां तो माना जा सकता है कि दिग्विजय सिंह और हिंदू आतंकवाद की प्रतीक साध्वी प्रज्ञा ठाकुर एक विषय हो सकती हैं। लेकिन ध्यान देने वाली बात यह भी है कि भोपाल लोकसभा के भी ग्रामीण क्षेत्रों में मतदान ज्यादा बढ़ा है। खेती किसानी से ज्यादा वास्ता ग्रामीण आबादी का ही होता है।एकतरफा सोचना ठीक नहीं है। इसलिए यह तथ्य भी नहीं बिसराया जा सकता कि यह प्रतिशत मोदी सरकार के खिलाफ जनादेश वाला मामला भी हो सकता है। अनेकानेक मोर्चों पर यह सरकार भी असफल रही है। लेकिन मोदी की प्रति नाराजगी या समर्थन तो देश भर में एक जैसा ही होता, इसमें मध्यप्रदेश क्यों अलग जाता दिख रहा है?  दिमाग पर बहुत अधिक जोर डालने के बावजूूद मामला नाथ या गांधी के बराबरी वाली नाराजगी का प्रतीत नहीं हो पाता। मध्यप्रदेश के संदर्भ में इसकी एक वजह नजर आती है। यहां पंद्रह साल बाद बनी कांग्रेस की सरकार से भाजपा-विरोधियों की अपेक्षाएं अनंत तक पहुंच गयी थीं। खासतौर पर दस दिन में कर्ज माफी की बात ने जनमत को सर्वाधिक प्रभावित किया था।  राहुल गांधी के सर्वप्रथम इस बेहद लोकप्रिय वादे की पहली अग्नि परीक्षा लोकसभा चुनाव में ही होना थी। किंतु मामला हवा-हवाई घोषणा के अधूरे से भी कमजोर अनुपालन तक सिमट कर रह गया।

इसलिए नाथ सरकार का अधिकांश समय अपनी साख बचाने में गुजर रहा है और उसको इस  बात का अधिक समय मिल ही नहीं पा रहा कि वह मोदी सरकार की असफलताओं को पुरजोर तरीके से जनता के सामने रख सके। बचपन में किसी सत्संग में एक किस्सा सुना था। रात के समय एक समूह नदी किनारे पहुंचा। उस पार जाने के लिए वे लोग एक नाव में बैठ गये। घुप अंधेरी रात में वे बारी-बारी से चप्पू चलाते रहे। किंतु किनारा नहीं आया। सुबह हुई तो उन्होंने सिर पीट लिया। क्योंकि वे रात के अंधेर में यह देख ही नहीं सके थे कि नाव की किनारे से बंधी रस्सी को उन्होंने खोला ही नहीं था। तो हुआ यह कि रात भर चप्पू चलाने की मेहनत के बावजूद वे वहीं रहे, जहां थे। लोकसभा चुनाव के नतीजों को लेकर फिलहाल ऐसा ही अंधकारमय माहौल है। हर दल अपने-अपने हिसाब से चप्पू चला रहा है।  हां, 23 मई को यह पता चलेगा कि किसकी रस्सी बंधी ही रह गयी और कौन खुली रस्सी की दम पर दूसरे किनारे तक पहुंचने में सफल रहा है। यह रस्सी अधूरे वादों की गांठ वाली हो सकती है। सरकार की नाकामियों के चलते भी बंधी रह सकती है। यह रस्सी सफल चुनावी रणनीति के जरिए खोली जा सकती है। इससे नाव को किसी वाकई जन-हितैषी छवि के चलते भी मुक्त कराया जा सकता है। 23 मई के बाद जो दूसरी पार दिखे, उसे सलाम और जो इसी पार हांफता दिखेगा, उससे यही उम्मीद की जा सकती है कि भविष्य में ऐसी गलती फिर से उसका दुर्भाग्य नहीं  बनेगी। अंत में भारी मतदान करने वालों को भी सलाम। कोई पार्टी हारे, चाहे कोई जीते। कम से कम ऐसे मतदाताओं के चलते लोकतंत्र के सदा जीतने का उत्सव तो मनाया ही जा सकता है।

एक पाती कमल हासन के नाम: डॉ प्रकाश भटनागर।

एक पाती कमल हासन के नाम
‘आप अच्छे अभिनेता हैं। कम से कम पत्नी सारिका और बेटियों सहित आपके परिवार के कुछ सदस्य आपको अच्छा इंसान भी मानते ही होंगे। तमिलनाडु के अरवाकुरिचि में मुस्लिमों की भारी संख्या है। वही अरवाकुरिचि, जहां आपने कहा कि देश का पहला आतंकवादी हिंदू था। जहां आप
जैसा सेक्यूलर, चुनाव जैसा माहौल और सुनने के लिए अल्पसंख्यक समुदाय के लोग हों, वहां  आपके इस शोध को सराहना तो मिली ही होगी। सो वहां लगे हाथ आपको बेहद संस्कारी परिवार का भी मान लिया गया होगा। तो हमारे स्तर से आप अच्छे अभिनेता, परिवार के लिहाज से बढ़िया इंसान और अरवाकुरिचि में बह रही सियासी हवा के अनुसार संस्कारी परिवार के सदस्य हैं। इन उपलब्धियों के लिये कृपया हमारी शुभकामनाएं स्वीकार करें। गुस्ताखी माफ, लेकिन एक बात कहेंगे। आप का इतिहास का ज्ञान बहुत कमजोर है। वरना नाथुराम गोड़से से पहले आपको सुहरावरदी
का पुण्य स्मरण हो गया होता। यह वही महापुरुष हैं, जिन्होंने आजादी के बाद कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता) में हुए हिंदू-विरोधी दंगों में मुस्लिमों का नेतृत्व किया था। इन गणमान्य नागरिक की बदौलत वहां सैंकड़ों हिंदुओं को कत्ल कर दिया गया। स्वयं पंडित (आपको संबोधित पत्र में ‘पंडित’
शब्द बुरा लगे तो कृपया क्षमा कीजिएगा) जवाहरलाल नेहरू श्री सुहरावरदीजी को लेकर मोहन दास करमचंद गांधी के  पास आये थे। तो हासन जी, बताइए जरा, आजाद भारत में गोडसे द्वारा की गयी एक हत्या से पहले की अनेक हत्याओं का दोषी तो सुहरावरदी था। फिर भला वह पहला आतंकवादी क्यों नहीं हुआ? क्यों नहीं आपने कहा कि देश का पहला आतंकवादी मुसलमान था? मैं जानता हूं कि आपने ऐसा क्यों नहीं कहा। आप उस प्रजाति के हैं, जो विचित्र किस्म का लंगोट पहनती है। किसी हिंदू के सामने पड़ने पर आप लंगोट कुश्ती की मुद्रा में कस लेते हैं। लेकिन मुस्लिम
पक्ष से कोई विरोधी आंखें तरेरे तो आपका लंगोट गीला और पीला, दोनो हो जाता है। क्या मेरी यह व्याख्या गलत है? विश्वरूपम आपकी ही फिल्म थी ना। मुस्लिमों ने इसके कुछ दृश्यों का विरोध किया तो आप ढीले पड़ गये थे। सात-सात दृश्य कटवा दिए आपने फिल्म के। लेकिन हिंदुओं की
महाभारत को ‘औरत को दांव पर लगाने वाली किताब’ कहने वाले अपने बयान से तो आप नहीं पलटे। क्योंकि आप जानते थे कि आपका सामना उस वर्ग से हो रहा है, जो शिक्षाजनित संस्कारों के चलते सहिष्णु है। वरना, सन 2017 में जिस तरह एक तमिल पत्रिका में आपने दक्षिणपंथियों को
उग्रवादी कहा था, वही तेवर किसी वक्त मुसलमानों के लिए दिखा दिये होते तो आपका क्या हश्र होता, यह आप बेहतर जानते हैं। इतना बेहतर कि आप और आप जैसे लोग बेहद कैल्क्यूलेटिव होकर उसकी निंदा करते हैं, जो चुपचाप इसे सुन ले और उसकी हर बुराई से आंख मूंद लेते हैं, जो तथ्यात्मक निंदा का जवाब भी सामने वाले की जुबान खींचकर देने की फितरत रखता है।
आपकी राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं किसी से छिपी नहीं हैं। समस्या यह कि इस किस्म की आपकी तबीयत उस समय हरी होना शुरू हुई, जब रजनीकांत ने राजनीतिक रुचि का प्रदर्शन आरम्भ किया। यहीं मामला आपके लिए बिगड़ने लगा। क्योंकि आपको एक अभिनेता के तौर पर गढ़ी गयी छवि के
जरिये जनता का समर्थन मिलने की उम्मीद थी। किंतु इस समर्थन के लिहाज से रजनीकांत आपसे कई गुना आगे हैं। तमिलनाडु में वह भगवान की तरह पूजे जाते हैं। आपको अपनी फिल्में हिट कराने के लिए उनमें स्पेशल इफेक्ट डालने होते हैं। इससे भी काम न चले तो फिल्म को लेकर विवाद

खड़े करने होते हैं। इधर, रजनीकांत को किसी फिल्म को सुपर हिट करने के लिए उसमें केवल अपना नाम देना होता है। फिर रजनीकांत का रुख भाजपा के प्रति अच्छा है। इसलिए आपको अपनी दाल गलाने के लिए हिंदू-विरोधी राजनीति से ही शुरूआत करना पड़ी है। ममता बनर्जी के साथ आपकी एक तस्वीर देखी है। उसमें आप एक थैला लेकर कैमरे के सामने खींसें निपोर रहे हैं। मुझे पूरा विश्वास है कि इस थैले में बनर्जी का वह तमाम साहित्य भरा होगा, जो आपको यह शिक्षा दे सके कि किस तरह सेक्यूलर होने के नाम पर घोर हिंदू-विरोधी राजनीतिक करके किसी राज्य का मुख्यमंत्री बना जा सकता है।
गोडसे ने गांधी की जान क्यों ली, इसे लेकर अपने-अपने मत और मतांतर हैं। हम आपसे यह नहीं कहते कि आप ‘मी नाथूराम गोडसे बोल्तोय’ पढ़ें, किंतु यह आग्रह तो आपसे किया ही जा सकता है कि आप देश का इतिहास वामपंथी या कांग्रेसी चश्मा लगाये बगैर भी पढ़ने की जहमत उठा लीजिए। आपने रविवार को फरमाया कि आप गांधी की हत्या का जवाब खोजने आये हैं। अच्छा काम है। हमारे लायक कुछ हो तो बताइएगा। भले ही अपना नहीं, पराया समझकर। लेकिन जवाब तो और भी कई खोजे जाने हैं। मसलन, वह कौन था जिसने सन 1947 के कबायली हमले में देश
की सेना को आगे बढ़ने से रोका? क्या वजह रही कि तिब्बत चीन को दे दिया गया। इस बेहोशी का कारण क्या था कि चीन अरुणाचल प्रदेश की भारी-भरकम जमीन हमसे छीन ले गया और हम कुछ न कर सके। यह सच भी तो पता लगाइए कि रुस्तम सोहराब नागरवाला की मौत कैसे हुई?

अरे! आपका ऐतिहासिक ज्ञान तो एकांगी है। इसलिए हम ही बता दें कि नागरवाला सन 1971 में स्टेट बैंक आॅफ इंडिया गया। दावा है कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उसे बैंक से साठ लाख रुपए लेने भेजा था। खुद इंदिराजी ने फोन करके बैंक के प्रमुख को बिना किसी चैक यह रकम नागरवाला के हवाले करने को कहा था। मामला खुला तो जांच बिठा दी गयी। विकीपीडिया पढ़ लीजिए। उसमें लिखा है, ‘नागरवाला नामक जिस व्यक्ति ने वह बड़ी रकम निकाली, उसको लेकर आज तक स्थिति स्पष्ट नहीं हो सकी। शुरू में उसे एक शातिर अपराधी माना गया, परन्तु धीरे-धीरे
संदेह की सुई श्रीमती गांधी और उनसे जुड़े कुछ निकटस्थों की तरफ भी घूमने लगी। जांच शुरू हुई और लंबी खिंची। उस दौरान नागरवाला, बैंक प्रबंधक तथा कुछ अन्य गवाहों की मौत एक के बाद एक होती गई। कोई ट्रक से कुचल गया तो कोई घर में संदिग्ध हालत में मृत पाया गया। उस कांड को पांच दशक हो गये परन्तु आज तक कोई नहीं जान सका कि वास्तविकता थी क्या?’ तो हासन साहब, इस बारे में भी जरा पड़ताल कर लीजिए। शायद आपकी कोशिशों से यह जवाब भी मिल जाए कि चुनाव में धांधली की कोर्ट द्वारा घोषित इंदिरा गांधी के छह साल तक चुनाव लड़ने पर लगी रोक का देश में आपातकाल लागू करने से क्या लेना-देना था? पहला और आखिरी आतंकी छोड़िए जनाब, यही बता दीजिए कि क्या आपातकाल के नाम पर हजारों लोगों की जबरिया  नसबंदी कर देने को आतंकवाद से कम श्रेणी में रखा जा सकता है?

कमल भाई, जवाब तो कई चीजों के तलाशे जाने हैं। आप को हमारी बताई बातों की पड़ताल नहीं करना, तो मत कीजिए। खोजिये केवल मोहन दास करमचंद गांधी की हत्या का जवाब। लेकिन हम भी कुछ तलाशने को स्वतंत्र हैं। यह खोज किसी की पैदाइश में खोट के स्रोत की भी हो सकती है। क्योंकि बिना किसी तथ्य के अपनी ही कौम को आतंकवादी कह देने वाला कोई शख्स सामान्य पैदाइश वाला तो नहीं ही माना जा सकता है।’

बाज़ को कठिन परिश्रम से उड़ना होता है।

आज का प्रेरक प्रसंग। कहानी ख़ुद हक़ीक़त बयाँ कर रही है।

बाज पक्षी जिसे हम ईगल या शाहीन भी कहते हैं। जिस उम्र में बाकी परिंदों के बच्चे चिचियाना सीखते हैं उस उम्र में एक मादा बाज अपने चूजे को पंजे में दबोच कर सबसे ऊंचा उड़ जाती है। पक्षियों की दुनिया में ऐसी Tough and tight training किसी भी ओर की नहीं होती।

मादा बाज अपने चूजे को लेकर लगभग 12 किलोमीटर  ऊपर ले जाती है।  जितने ऊपर अमूमन जहाज उड़ा करते हैं और वह दूरी तय करने में मादा बाज 7 से 9 मिनट का समय लेती है।

यहां से शुरू होती है उस नन्हें चूजे की कठिन परीक्षा। उसे अब यहां बताया जाएगा कि तू किस लिए पैदा हुआ है? तेरी दुनिया क्या है? तेरी ऊंचाई क्या है? तेरा धर्म बहुत ऊंचा है और फिर मादा बाज उसे अपने पंजों से छोड़ देती है।

धरती की ओर ऊपर से नीचे आते वक्त लगभग 2 किलोमीटर तक उस चूजे को आभास ही नहीं होता कि उसके साथ क्या हो रहा है। 7 किलोमीटर के अंतराल के आने के बाद उस चूजे के पंख जो कंजाइन से जकड़े होते हैं, वह खुलने लगते हैं।

लगभग 9 किलोमीटर नीचे आने के बाद उनके पंख पूरे खुल जाते हैं। यह जीवन का पहला दौर होता है जब बाज का बच्चा पंख फड़फड़ाता है।

अब धरती से वह लगभग 3000 मीटर दूर है लेकिन अभी वह उड़ना नहीं सीख पाया है। अब धरती के बिल्कुल करीब आता है जहां से वह देख सकता है उसके स्वामित्व को। अब उसकी दूरी धरती से महज 700/800 मीटर होती है लेकिन उसका पंख अभी इतना मजबूत नहीं हुआ है की वो उड़ सके।

धरती से लगभग 400/500 मीटर दूरी पर उसे अब लगता है कि उसके जीवन की शायद अंतिम यात्रा है। फिर अचानक से एक पंजा उसे आकर अपनी गिरफ्त मे लेता है और अपने पंखों के दरमियान समा लेता है।
यह पंजा उसकी मां का होता है जो ठीक उसके उपर चिपक कर उड़ रही होती है। और उसकी यह ट्रेनिंग निरंतर चलती रहती है जब तक कि वह उड़ना नहीं सीख जाता।
यह ट्रेनिंग एक कमांडो की तरह होती है। तब जाकर दुनिया को एक बाज़ मिलता है अपने से दस गुना अधिक वजनी प्राणी का भी शिकार करता है।

हिंदी में एक कहावत है... "बाज़ के बच्चे मुँडेर पर नहीं उड़ते।"

बेशक अपने बच्चों को अपने से चिपका कर रखिए पर  उसे दुनियां की मुश्किलों से रूबरू कराइए, उन्हें लड़ना सिखाइए। बिना आवश्यकता के भी संघर्ष करना सिखाइए। ये TV के रियलिटी शो और अंग्रेजी स्कूल की बसों ने मिलकर आपके बच्चों को "ब्रायलर मुर्गे" जैसा बना दिया है जिसके पास मजबूत टंगड़ी तो है पर चल नहीं सकता। वजनदार पंख तो है पर उड़ नही सकता क्योंकि...

_"गमले के पौधे और जंगल के पौधे में बहुत फ़र्क होता है।"

शाह फैसल: आईएएस वह भी कश्मीरी।


आइये आपको मिलाते है शाह फैसल से।।
शाह फैसल जो किसी ताअरूफ के मोहताज नहीं है आज मुल्क़ की जाना पहचाना नाम शाह फैसल एक साबिक सिविल IAS अफसर और आज जम्मू कश्मीर की सियासत में एक नया आफताब।।

शाह फैसल को शाह फैसल बनाया किसने??
शाह फैसल कश्मीर में पैदा हुए उनके वालिद एक टीचर थे जिनका गोली मारकर कत्ल कर दिया गया,शाह फैसल ने तालीम को अपना हथियार बनाया और आगे बढ़ते चले गये,उन्हे कश्मीर के अंदर इंकलाब बरपा करना था तबदीली लानी थी जिसके लिये उन्होने "सिविल सर्विस" को चुना।।
लोगों ने उनसे कहा कि कभी किसी कश्मीरी को सिविल सर्विसेज में जगह नहीं मिलती है खामोखां वक्त रायगा कर रहे हो पर शाह फैसल के हौसले बुलंद थे उन्होने ठान लिया था कि मुझे एक नयी सोच लाना है आवाम का ज़हन बदलना है और हुआ भी शाह फैसल ने 2009 में सिविल सर्विस एक्ज़ाम में आल इंडिया में टॉप किया और पहले कश्मीरी बने जिसे  सिविस सर्विस एक्ज़ाम में अव्वल आने का एजाज़ मिला।।

ये सब हुआ शाह फैसल की मेहनत,उनके हौसले,नेक इरादे और तालीम की वजह से।।

आज के वक्त में तालीम, कलम, किताब सबसे बड़े हथियार हैं जिनके बल पर हर जंग जीती जा सकती है। हर मरहला पार किया जा सकता है। आज ज़रूरत है हम सबको एक ऐसा माहोल पैदा करने की हर घर का, पड़ोस का, आस पास का कोई भी बच्चा तालीम से स्कूल जाने से महरूम ना रहे।
बाबा साहब अबेंडकर ने भी शिक्षा पर सबसे ज़्यादा ध्यान देने की बात कही थी।।
"उनका नारा था शिक्षित रहो"

समझदार बीवी। मददगार बीवी।

#पत्नि_हो_तो_ऐैसी

बेटा अब खुद कमाने वाला हो गया था ...इसलिए  बात-बात पर  अपनी माँ से झगड़ पड़ता था .... ये  वही माँ थी जो बेटे के  लिए पति से भी लड़ जाती थी।मगर अब फाइनेसिअली   इंडिपेंडेंट बेटा  पिता के कई बार समझाने पर भी  इग्नोर  कर देता और कहता, "यही तो उम्र है शौक की, खाने पहनने की, जब  आपकी तरह मुँह में दाँत और पेट में आंत ही नहीं रहेगी तो क्या करूँगा।"

बहू खुशबू  भी भरे पूरे परिवार से आई थी, इसलिए बेटे की गृहस्थी की खुशबू में रम गई थी। बेटे की नौकरी  अच्छी थी तो  फ्रेंड सर्किल  उसी हिसाब से मॉडर्न थी । बहू को अक्सर वह पुराने स्टाइल के कपड़े छोड़ कर मॉडर्न बनने को कहता, मगर बहू मना कर देती .....वो कहता "कमाल करती हो तुम, आजकल सारा ज़माना ऐसा करता है, मैं क्या कुछ नया कर रहा हूँ। तुम्हारे सुख के लिए सब कर रहा हूँ और तुम हो कि उन्हीं पुराने विचारों में अटकी हो। क्वालिटी लाइफ क्या होती है तुम्हें मालूम ही नहीं।"

और बहू कहती "क्वालिटी लाइफ क्या होती है, ये मुझे जानना भी नहीं है, क्योकि  लाइफ की क्वालिटी क्या हो, मैं इस बात में विश्वास रखती हूँ।"

आज अचानक पापा   आई. सी. यू. में एडमिट  हुए थे। हार्ट अटेक आया  था। डॉक्टर ने पर्चा पकड़ाया, तीन लाख और जमा करने थे। डेढ़ लाख का बिल तो पहले ही भर दिया था मगर अब ये तीन लाख भारी लग रहे थे। वह बाहर बैठा हुआ सोच रहा था कि अब क्या करे..... उसने कई दोस्तों को फ़ोन लगाया कि उसे मदद की जरुरत है, मगर किसी ने कुछ तो किसी ने कुछ बहाना कर दिया। आँखों में आँसू थे और वह उदास था।.....तभी खुशबू  खाने का टिफिन लेकर आई और बोली, "अपना ख्याल रखना भी जरुरी है। ऐसे उदास होने से क्या होगा? हिम्मत से काम लो, बाबू जी को कुछ नहीं होगा आप चिन्ता मत करो । कुछ खा लो  फिर पैसों का इंतजाम भी तो करना है आपको।.... मैं यहाँ बाबूजी के पास रूकती हूँ आप खाना खाकर पैसों का इंतजाम कीजिये। ".......पति की आँखों से टप-टप आँसू झरने लगे।

"कहा न आप चिन्ता मत कीजिये। जिन दोस्तों के साथ आप मॉडर्न पार्टियां करते हैं आप उनको फ़ोन  कीजिये , देखिए तो सही, कौन कौन मदद को आता हैं।"......पति खामोश और सूनी निगाहों से जमीन की तरफ़ देख रहा था। कि खुशबू का   का हाथ  उसकी पीठ  पर आ गया। और वह पीठ  को सहलाने लगी।

"सबने मना कर दिया। सबने कोई न कोई बहाना बना दिया खुशबू ।आज पता चला कि ऐसी दोस्ती तब तक की है जब तक जेब में पैसा है। किसी ने  भी  हाँ नहीं  कहा  जबकि उनकी पार्टियों पर मैंने लाखों उड़ा दिये।"

"इसी दिन के लिए बचाने को तो माँ-बाबा कहते थे। खैर, कोई बात नहीं, आप चिंता न करो, हो जाएगा सब ठीक। कितना जमा कराना है?"

"अभी तो तनख्वाह मिलने में भी समय है, आखिर चिन्ता कैसे न करूँ खुशबू ?"

"तुम्हारी ख्वाहिशों को मैंने सम्हाल रखा है।"

"क्या मतलब?"

"तुम जो नई नई तरह के कपड़ो और दूसरी चीजों के लिए मुझे पैसे देते थे वो सब मैंने सम्हाल रखे हैं। माँ जी ने फ़ोन पर बताया था, तीन लाख जमा करने हैं। मेरे पास दो लाख थे। बाकी मैंने अपने भैया से मंगवा लिए हैं। टिफिन में सिर्फ़ एक ही डिब्बे में खाना है बाकी में पैसे हैं।" खुशबू  ने थैला टिफिन सहित उसके हाथों में थमा दिया।

"खुशबू ! तुम सचमुच अर्धांगिनी हो, मैं तुम्हें मॉडर्न बनाना चाहता था, हवा में उड़ रहा था। मगर तुमने अपने संस्कार नहीं छोड़े.... आज वही काम आए हैं। "

सामने बैठी माँ के आँखो में आंसू थे  उसे आज  खुद के नहीं  बल्कि पराई माँ के संस्कारो पर नाज था  और वो  बहु के सर पर हाथ फेरती हुई ऊपरवाले का शुक्रिया अदा कर रही थी।

मेरी माँ और मैं। हर वक़्त नज़र आती माँ।

HAPPY MOTHER'S DAY

मेरी माँ और मैं
मां पर किसने क्या नहीं लिखा. दुनिया लिख डाली. उर्दू ग़ज़ल में मां पर सबसे ज़्यादा मुनव्वर राना ने लिखा है. उनसे पहले ग़ज़ल में सब कुछ था. माशूक़, महबूब, हुस्न, साक़ी सब. तरक़्क़ीपसंद अदब और बग़ावत भी. पर मां नहीं थी. इसलिए उन्होंने कहा भी है कि,
मेरे पसंदीदा शायर मुनव्वर राणा ने मां पर क्या खूब कहा-

लबों पे उसके कभी बद्दुआ नहीं होती
बस एक माँ है जो मुझसे ख़फ़ा नहीं होती

ऐ अँधेरे! देख ले मुँह तेरा काला हो गया
माँ ने आँखें खोल दीं घर में उजाला हो गया

मेरी ख़्वाहिश है कि मैं फिर से फ़रिश्ता हो जाऊँ
माँ से इस तरह लिपट जाऊँ कि बच्चा हो जाऊँ

इस तरह मेरे गुनाहों को वो धो देती है
माँ बहुत ग़ुस्से में होती है तो रो देती है

मैंने कल शब चाहतों की सब किताबें फाड़ दीं
सिर्फ़ इक काग़ज़ पे लिक्खा लफ़्ज़—ए—माँ रहने दिया

ये ऐसा क़र्ज़ है जो मैं अदा कर ही नहीं सकता,
मैं जब तक घर न लौटूं, मेरी माँ सज़दे में रहती है

जब भी कश्ती मेरी सैलाब में आ जाती है
मां दुआ करती हुई ख्वाब में आ जाती है

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मोदी की जीत भारतीय राजनैतिक चेतना का तीसरा सोपान है।

उनके लिए जिन्हें देश से प्रेम भी है और देश की फिक्र भी है मोदी की जीत भारतीय राजनैतिक चेतना का तीसरा सोपान है। पिछड़ों और दलितों की राजनीत...